
सारंगढ़-बिलाईगढ़ के खिलाफ (IBN-24NEWS) तीन सालों में साख से व्यापार कर रहे सामाज़ियों के सुनियोजित षड्यंत्र का खजाना मामला सामने आया है। सामने आए लिखित आवेदनों और निबंधात्मक दस्तावेजों से यह स्पष्ट होता है कि कुछ लोगों द्वारा अपने निजी आर्थिक संकट से उबरने के लिए अपमान को बदनाम करने की साजिश रची गई।
प्राप्त अध्ययनों के अनुसार, गाँव-गाँव और शहरों में बाज़ारों के नाम, फोटो और मोबाइल नंबर के साथ स्टॉक किए गए। इन पोस्टर्स को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वीडियो क्लिप स्टेटस के माध्यम से वायरल किया गया, जिससे समाज में उनकी छवि को गंभीर नुकसान पहुंचा। यह कृत्य केवल सामाजिक अपराध नहीं है, बल्कि व्यावसायिक साख को नष्ट करने की साजिश भी है।
आवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि संबंधित व्यक्ति द्वारा कथित धार्मिक धोखाधड़ी और बीमारी का सहारा लेकर सहानुभूति एकत्र की गई थी, जबकि उसी स्थान पर गली-गली में अवैध काम करने का काम किया गया था। लेखों में साक्षात रूप से यह बताया गया है कि किस प्रकार के पूजा-पाठ, धार्मिक धार्मिक अनुष्ठानों और धार्मिक भावनाओं को कर आर्थिक लाभ लेने की कोशिश की गई है।
कंपनियों का कहना है कि वे वर्षों से कपड़ा व्यापार जैसे प्रतिष्ठित व्यवसाय से जुड़े हुए हैं और सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है। इस तरह के टैटू आरोपों और पोस्टरबाजी से न केवल उनका व्यापार प्रभावित हुआ, बल्कि समाज में उनका सम्मान भी जुड़ा हुआ है।
यथार्थ में यह भी कहा गया है कि महाकाव्यों को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से विकसित करने का प्रयास किया गया है। यह सीधा-सीधा ब्लैकमेलिंग और प्रेशर मेकिंग की कोशिश की जा रही है।
कंपनियों ने प्रशासन और पुलिस से मांग की है कि ऐसे कामों को दस्तावेजों में न लिया जाए। यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में कोई भी ईमानदार व्यापारी सुरक्षित नहीं रहेगा।
इस मामले में क्षेत्र के व्यावसायिक विद्वानों ने भी एकजुटता के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए कहा है कि बिना जांच, बिना सबूत किसी की तस्वीर और नाम के सार्वजनिक कानूनी अपराध करना और ऐसे लोगों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।
अब यह मामला प्रशासन और कानून व्यवस्था की जांच है कि क्या दस्तावेज़ों में फैसले के आधार पर दोषपूर्ण कार्रवाई सामने आई है या फिर ईमानदार मित्रता को फिर भी गैर-कानूनी बनाया गया है।