
कोरबा (I B N- 24) कोरबा जनपद अंतर्गत के जंगली क्षेत्रों में बसे वन ग्राम धनगांव में शासकीय उचित मूल्य के नवीन भवन निर्माण कार्य में छोटे छोटे नाबालिग बच्चों से मजदूरी का काम लेने की जानकारी विगत कुछ दिनों स्थानीय ग्रामीणों द्वारा प्राप्त हुआ था जिसके संबंध में समाचार संकलन कर प्रसारित किया गया था। इस दौरान पत्रकारों ने देखा की शासकीय भवन निर्माण कार्य में नाबालिक बच्चों से मजदूरी कराया जा रहा था बच्चों से पूछने पर उन्होंने अपना उम्र 14 साल और एक ने 17 साल बताया और लगभग 3 से 4 दिन हो चुके हैं उन्हें काम करते हुए । उन्होंने यह भी बताया की 250 से 300 रुपए तक की दैनिक मजदूरी पर बच्चों से काम लिया जा रहा है । जिसमें ग्राम पंचायत धनगांव के सरपंच कलेश सिंह कंवर और पंचायत सचिव के निर्देश में काम लिया जाना बताया गया था ।
इस संबंध में खबर प्रसारित कर संबंधित विभाग के जनपद सीईओ कोरबा को जानकारी दिया गया था । जिसमें जनपद सीईओ कोरबा द्वारा तत्काल संज्ञान लेते हुए तीन दिनों के भीतर ग्राम पंचायत धनगांव के सरपंच/सचिव से स्पष्टीकरण मांगा गया है ।
ज्ञात हो की कोरबा जिले के कई अलग अलग जगहों पर कम उम्र के बच्चों से काम लेते देखा गया है इसी कड़ी में कोरबा जनपद अंतर्गत के ग्राम पंचायत धनगांव से भी यह जानकारी निकल कर सामने आई थी।
अक्सर देखा गया है कि गरीबी की अंधकार में पेट भरने के मजबूरी में मजदूरी करते वयस्क उम्र से कम उम्र के बच्चे। आज इस अत्याधुनिक युग में भी भुखमरी और गरीबी का दंश झेल रहे लोग अपने बच्चों को मजदूरी में लगा देते हैं। इससे नौनिहालों का भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है। खुलेआम बालश्रम कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। हर चौराहे, हर नुक्कड़ पर बाल श्रमिक काम करते दिख रहे हैं। अक्सर चाय की दुकानों में बच्चे कप-गिलास धोते हुए दिख जाते थे लेकिन आज के समय में विभिन्न संस्थानों और विभागों के भवन निर्माण में भी और जेसीबी या ट्रैक्टर आदि में खलासी मजदूर के रूप में नाबालिक बच्चे बिना सेफ्टी उपकरणों के काम करते हुए दिख रहे है ।यह हमारा दुर्भाग्य है जो हम उनसे उनका बचपन छीन रहे है ।
नन्हे होंठों पर फूलों सी खिलती हंसी, मुस्कुराहट, शरारत, जिद पर अड़ जाना यह सब बचपन की पहचान होती है। इन सबके उलट कुछ बच्चे अपने बचपन से महरूम हो गए हैं। और कठिन दिहाड़ मजदूरी करने के लिए आर्थिक मजबूरी वस बाध्य है।
बाल श्रमिकों को मुक्त करा कर सिर्फ उन्हें उनके स्वजनों तक पहुंचा देना ही प्रशासन के लोग अपना कर्तव्य समझते हैं, लेकिन बाल श्रमिकों की मजबूरी गरीबी और भुखमरी का निदान कराने में कोई दिलचस्पी विभाग नहीं लेते । बाल श्रम कानून और बाल मानव अधिकार के नियम और कानून केवल किताबों के पन्नों तक ही सीमित रह गई है ।आलम यह है कि धड़ल्ले से व्यापारी और संविदाकार इन बच्चों से बाल मजदूरी करवा कर इनका शोषण कर रहे हैं। पैसे कमाने के चक्कर में लोग ऐसे अंधे हो गए हैं कि नौनिहालों के भविष्य की भी परवाह नहीं कर रहे हैं।
भारत भर में विभिन्न संस्थानों, विभागों और धर्मार्थ संस्था या संगठनों द्वारा विभिन्न प्रकार के बाल श्रम अभियान/जागरूकता कार्यक्रम या शिविर चलाया जाता रहा है उसके बाद भी स्थिति में पूरी तरह से कोई सुधार नहीं हुआ है।
अलग अलग जिलों के श्रम संस्थान और विभाग के द्वारा कई बार बाल श्रम जागरूक अभियान चलाया गया है। कई बालक को मजदूरी करते हुए कई स्थानो से मुक्त भी कराया जा चुका है।
बाल श्रम कानून अपराध है यह सभी जानते है । इसे रोकने के लिए सरकार ने सख्त कानून बनाया है। विभागीय पदाधिकारी इसके अनुपालन में लगे हैं, पर इसके बाद भी बालश्रम कानून की धज्जियां आज भी कई स्थानों पर उड़ाते देखी जा सकती है । विभिन्न प्रतिष्ठानों, घरों, बाजारों में नाबालिग बच्चों से मजदूरी करवायी जा रही है। बाल श्रम कानून को प्रभावी बनाने के लिए श्रम विभाग को लगातार अभियान चलाने की जरूरत है। लेकिन श्रम विभाग कोरबा जिले अंतर्गत निष्क्रिय साबित होते दिख रहा है।