
रायपुर। भाजपा झुग्गी-झोपड़ी प्रकोष्ठ के प्रदेश सह संयोजक राजेश यादव ने प्रदेशभर के शासकीय विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में लगातार घटती छात्र संख्या पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि समय रहते प्रभावी सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह स्थिति प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर संकट का रूप ले सकती है।
राजेश यादव ने कहा कि आज प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की स्थिति को एक चर्चित कथन से समझा जा सकता है— “जहाँ स्कूल हैं वहाँ शिक्षक नहीं, जहाँ शिक्षक हैं वहाँ भवन नहीं, और जहाँ स्कूल, शिक्षक तथा भवन तीनों उपलब्ध हैं, वहाँ छात्र नहीं।” यह कथन शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों की ओर संकेत करता है और व्यापक सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
उन्होंने कहा कि शासकीय विद्यालयों में प्रशिक्षित एवं विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की उपलब्धता तथा शासन द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं के बावजूद अभिभावकों का विश्वास लगातार कम हो रहा है। दूसरी ओर निजी विद्यालय नियमित कक्षाएं, अनुशासित वातावरण, समयबद्ध शिक्षण, सतत मूल्यांकन तथा अभिभावकों से बेहतर संवाद के कारण विद्यार्थियों और पालकों का विश्वास अर्जित करने में सफल हो रहे हैं।
राजेश यादव ने कहा कि निजी विद्यालयों के शिक्षक एवं प्रबंधन प्रवेश सत्र के दौरान घर-घर जाकर पालकों से संपर्क करते हैं, गृह-भेंट कर विद्यार्थियों के प्रवेश के लिए प्रेरित करते हैं तथा पूरे वर्ष अभिभावकों से निरंतर संवाद बनाए रखते हैं। इसके विपरीत अनेक शासकीय विद्यालयों में इस प्रकार का नियमित गृह-भेंट एवं पालक संपर्क अपेक्षित स्तर पर देखने को नहीं मिलता। यदि सरकारी विद्यालय भी नियमित जनसंपर्क, गृह-भेंट अभियान एवं पालकों के साथ सतत संवाद स्थापित करें, तो निश्चित रूप से सरकारी विद्यालयों के प्रति विश्वास बढ़ेगा और प्रवेश संख्या में वृद्धि होगी।
उन्होंने कहा कि अनेक शासकीय शिक्षक स्वयं अपने बच्चों का प्रवेश निजी विद्यालयों में कराते हैं, जिससे आम अभिभावकों के बीच सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता को लेकर नकारात्मक संदेश जाता है। इस धारणा को बदलने के लिए सरकारी शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बहाल करना अत्यंत आवश्यक है।
राजेश यादव ने कहा कि शासकीय विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल शिक्षा विभाग की नहीं, बल्कि शाला प्रबंधन एवं विकास समिति, पालकों, जनप्रतिनिधियों तथा समाज के प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक की भी है। विद्यालयों के विकास और नामांकन अभियान को जनभागीदारी से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि केवल “शाला प्रवेशोत्सव” मनाकर औपचारिकता पूरी कर लेना पर्याप्त नहीं है। प्रवेशोत्सव के बाद पूरे शैक्षणिक सत्र में घर-घर संपर्क अभियान, पालक बैठकों का नियमित आयोजन, विद्यालयों की सतत समीक्षा, विद्यार्थियों की उपस्थिति एवं शैक्षणिक प्रगति की निगरानी तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यदि शाला प्रबंधन समिति, पालक, जनप्रतिनिधि और शिक्षा विभाग समन्वित रूप से कार्य करें, तभी शासकीय विद्यालयों के प्रति समाज का विश्वास पुनः स्थापित होगा।
उन्होंने कहा कि यह समस्या केवल शासकीय प्राथमिक, माध्यमिक, हाई एवं हायर सेकेंडरी विद्यालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि शासकीय महाविद्यालयों में भी अनेक पाठ्यक्रमों की सीटें रिक्त रह जाना गंभीर चिंता का विषय है। यह स्थिति दर्शाती है कि सरकारी शिक्षण संस्थानों के प्रति विद्यार्थियों एवं अभिभावकों का भरोसा लगातार कमजोर हो रहा है। इसलिए स्कूल शिक्षा के साथ-साथ उच्च शिक्षा में भी गुणवत्ता सुधार, आधुनिक संसाधन, रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रम, नियमित शैक्षणिक गतिविधियों तथा प्रभावी जनसंपर्क पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
राजेश यादव ने राज्य सरकार से मांग की कि प्रवेश उत्सव, स्कूल चले अभियान एवं अन्य शैक्षणिक योजनाओं को केवल औपचारिक कार्यक्रम तक सीमित न रखा जाए, बल्कि पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति, आधारभूत सुविधाओं का विस्तार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, आधुनिक तकनीकी शिक्षा, अनुशासित शैक्षणिक वातावरण, पारदर्शी मूल्यांकन, पालक संवाद तथा शिक्षकों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ठोस कार्ययोजना लागू की जाए।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सरकार, शिक्षा विभाग, जनप्रतिनिधि, शाला प्रबंधन समितियाँ, पालक एवं समाज मिलकर कार्य करें तो शासकीय विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में विद्यार्थियों की घटती संख्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है तथा सरकारी शिक्षा व्यवस्था में आमजन का विश्वास पुनः स्थापित किया जा सकता है।