गौ सेवा करते हुए गोबर और गौ मूत्र से बने उत्पादों का उपयोग के प्रेरणाश्रोत बने ग्राम रजकम्मा निवासी गौ पालक गणेश शर्मा जी।

कोरबा (आई.बी.एन – 24) देशी गाय के गोबर और गौमूत्र से बने उत्पाद (खाद, दीये, अगरबत्ती) ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार का माध्यम बन रहे हैं, साथ ही जैविक खेती को बढ़ावा देकर पर्यावरण की रक्षा कर रहे हैं। गौपालन कर रहे लोग गोबर से वर्मी कम्पोस्ट, प्राकृतिक कीटनाशक और अन्य उत्पाद बनाकर स्थायी आय और गोवंश संवर्धन में योगदान दे रहे हैं। इसी कड़ी में कोरबा जिले के ग्राम रजकम्मा (मदनपुर) निवाशी गणेश शर्मा जी लगभग 40 वर्षों से गौ पालक के रूप में गौ सेवा में निरंतर लगे हुए है।
देसी गाय के गोबर से बने उत्पादों से बेरोजगारों को आय का स्रोत और पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेकर प्रकृति और पर्यावरण के साथ कृत्रिम खेती में भी अपना योगदान दे रहे हैं । गौ माता की संरक्षण और संवर्धन को ध्यान में रखकर गोबर से बने उत्पादों को आगे बढ़ने का जज्बा लिए 40 वर्षों से गौ पालक बने गणेश शर्मा जी का कहना है
“प्रकृति और पर्यावरण को सुरक्षित रखने जिस प्रकार राम सेतु में गिलहरी का जो सहयोग रहा ठीक वैसा ही विचार रख कर गौ माता जी का सेवक बन कर , गोबर का उत्पाद बनाते हुए गोबर और गौ मूत्र से प्रकृति और पर्यावरण को सुरक्षित रखने का संकल्प लिए अपनी विचार धारा में गौ माता की सेवा के साथ साथ बेरोजगार भाई बहनों के स्वयं का रोजगार स्थापित करना हमारा मुख्य उद्देश्य है ”
साथ ही रजकम्मा निवासी गौ पालक गणेश शर्मा जी का यह कहना भी है कि गोबर से बने हुए कई उत्पादों की ट्रेनिंग लेकर वह उत्तराखंड से पुष्पक सिंह धामी सरकार से प्रारंभिक दौर में उनके प्रशिक्षक धीरज चौधरी जी के सानिध्य में गोबर से बने उत्पादों जैसे कि दीपक,हवन लकड़ी , धूप बत्ती, उपले, देवी देवताओं की मूर्ति आदि बनना सिखाया गया है और कृषक भाइयों के लिए आर्गेनिक खाद्य का प्रशिक्षण आदि प्राप्त कर चुके है और अपने निवास स्थान ग्राम रजकम्मा में गोबर से बने उत्पाद तैयार कर पर्यावरण और गौ वंश संरक्षण में अपना प्रमुख योगदान दे रहे है। उनका संपर्क नम्बर 9302892174 .
उनके द्वारा गोबर से बने उत्पादों को निर्मित कर उसके माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और स्वरोजगार के विषय को लेकर मुख्य रूप से कार्य रहे है। जैसे इसके फायदे निम्न प्रकार से हमें प्राप्त होता है -:
गोबर से बने उत्पादों से आय का स्रोत और आत्मनिर्भरता:
गोबर से वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद) बनाकर किसान ₹8-₹15 प्रति किलो की दर से बेच रहे हैं, जो उनकी आय का एक अच्छा जरिया है। गोबर से बने उत्पाद जैसे उपले, दीपक, और अन्य धार्मिक वस्तुएं भी लोकप्रिय हो रही हैं।
पर्यावरण की रक्षा:
रासायनिक खादों की जगह गोबर की खाद का उपयोग करने से मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है और पर्यावरण प्रदूषण कम होता है। यह टिकाऊ खेती के लिए एक अच्छा विकल्प है।
गोवंश संरक्षण:
गाय के गोबर और गौमूत्र का व्यावसायिक उपयोग करके किसान गायों को पालने के लिए प्रोत्साहित हो रहे हैं, जिससे गोवंश का संवर्धन (संरक्षण और विकास) हो रहा है।
कृत्रिम और प्राकृतिक खेती में योगदान:
गोबर और गौमूत्र से जीवामृत (natural liquid fertilizer) और पंचगव्य जैसे उत्पाद बनाकर, यह जैविक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं, जो स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर है।
अनुभव और समर्पण:
40 वर्षों से अधिक समय से गौपालन करने वाले लोग अब इन उत्पादों के माध्यम से न केवल पारंपरिक ज्ञान को आगे बढ़ा रहे हैं, बल्कि इसे आत्मनिर्भर भारत के मिशन से भी जोड़ रहे हैं।