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लक्ष्मणेश्वर, लिंगेश्वर और कलेश्वरनाथ मंदिरों में उमड़ी श्रद्धालुओं की भारी भीड़…।

जांजगीर-चांपा,15 फरवरी(आई.बी.एन-24)। जांजगीर-चांपा जिले का खरौद का लक्ष्मणेश्वर मंदिर, नवागढ़ का लिंगेश्वर महादेव और पीथमपुर का बाबा कलेश्वरनाथ मंदिर में तड़के सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। मंदिर समितियों ने पर्व के लिए व्यापक तैयारियां की थीं, वहीं सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल भी तैनात किया गया था। शिवरीनारायण क्षेत्र को रामायण काल से जुड़ा माना जाता है और यह प्राचीन दंडकारण्य का हिस्सा था। शिवरीनारायण से लगभग 5 किलोमीटर दूर खरौद स्थित है, जिसे खर और दूषण की नगरी भी कहा जाता है। यहां स्थापित शिवलिंग में लाखों सूक्ष्म छिद्र हैं, जिसके कारण इसे लक्ष्मणेश्वर शिवलिंग कहा जाता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि इस शिवलिंग में जल स्तर न तो कम होता है और न ही बढ़ता है, इसलिए इसे अक्षय कुंड भी कहते हैं। यहां के जल को गंगा, यमुना और सरस्वती के समान पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि लंका विजय के बाद ब्राह्मण रावण वध के पाप से मुक्ति पाने के लिए लक्ष्मण जी ने यहां भगवान शिव की आराधना की थी।

महाशिवरात्रि पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब महाशिवरात्रि के अवसर पर लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचे। मंदिर में ‘लाख चावल’ चढ़ाने की परंपरा भी विशेष आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां भगवान शिव की पूजा करने से क्षय रोग से मुक्ति मिलती है।

नवागढ़ का लिंगेश्वर महादेव मंदिर, स्वयंभू शिवलिंग की अनोखी मान्यता नवागढ़ स्थित लिंगेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धालुओं की विशेष आस्था का केंद्र है। यहां विराजमान शिवलिंग स्वयंभू माना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस शिवलिंग की ऊंचाई लगातार बढ़ रही है और इसकी मोटाई भी अनूठी है। शिवलिंग की वास्तविक गहराई जानने के लिए शोध किए गए, लेकिन अब तक इसका सही अनुमान नहीं लग पाया है। श्रद्धालु यहां वंश वृद्धि और मनोकामना पूर्ति के लिए पूजा-अर्चना करते हैं।

हसदेव तट पर पीथमपुर का कलेश्वरनाथ मंदिर, उदर रोगों से मुक्ति की मान्यता हसदेव नदी के तट पर बसे पीथमपुर में कलेश्वरनाथ बाबा शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, चांपा के एक जमींदार पेट संबंधी रोग से पीड़ित थे। इलाज से लाभ नहीं मिलने पर उन्होंने भगवान शिव का स्मरण किया। स्वप्न में उन्हें पीथमपुर में शिवलिंग होने का संकेत मिला। खोज के दौरान वहां शिवलिंग मिला, जिसके बाद विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा कर मंदिर की स्थापना की गई। पूजा-अर्चना के बाद जमींदार का रोग ठीक हो गया। तभी से यह मंदिर उदर रोगों से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध माना जाता है।

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