
विशेष रिपोर्ट | कोरबा (छत्तीसगढ़), 17 सितंबर 2026 [2026] छत्तीसगढ़ के कोरबा जिला अंतर्गत कटघोरा नगर पालिका परिषद इन दिनों राजनैतिक शुचिता के अवसान और प्रशासनिक अधोगति का कुरुक्षेत्र बन चुकी है। वार्ड क्रमांक 01 (नेहरू नगर, छिर्रा) की सजग एवं निर्वाचित पार्षद श्रीमती राजेश्वरी जात्रा ने पालिका अध्यक्ष श्री राज जायसवाल के दमनकारी, मनमाने और अलोकतांत्रिक आचरण के विरुद्ध एक अत्यंत साहसिक और चौतरफा संघर्ष की शुरुआत की है। अपनी अस्मिता, नागरिक अधिकारों और जनहित की रक्षा के लिए पीड़ित महिला पार्षद ने पुलिस अधीक्षक (SP) और जिला कलेक्टर के समक्ष औपचारिक रूप से लिखित शिकायत सौंप दी है। इसके साथ ही उन्होंने अपनी ही पार्टी के भाजपा जिलाध्यक्ष श्री गोपाल मोदी को भी मामले से अवगत कराकर न्याय की गुहार लगाई है।

इतने गंभीर और संवेदनशील मामले में आधिकारिक तौर पर शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद राजनैतिक और प्रशासनिक हलकों में सरगर्मी तेज हो गई है। यह संपूर्ण प्रकरण वर्तमान शासनकाल में महिला जनप्रतिनिधियों की राजनैतिक सुरक्षा और आत्मसम्मान को लेकर एक अहम विमर्श खड़ा करता है।
भाजपा जिलाध्यक्ष गोपाल मोदी का त्वरित हस्तक्षेप: ‘अस्मिता और विकास से समझौता नहीं’

मामले की गंभीरता को देखते हुए भाजपा जिलाध्यक्ष श्री गोपाल मोदी ने इस पूरे प्रकरण को तत्काल प्रभाव से अपने कड़े संज्ञान में लिया है। संगठन प्रमुख ने बिना विलंब किए कटघोरा नगर पालिका के मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) को सीधे फोन लगाकर वस्तुस्थिति की पूरी जानकारी मांगी और अपनी तीव्र नाराजगी व्यक्त की।
जिलाध्यक्ष ने अत्यंत कड़े और स्पष्ट शब्दों में प्रशासनिक अमले को चेतावनी देते हुए कहा है कि “एक महिला जनप्रतिनिधि के सम्मान, स्वाभिमान और उनके वार्ड के विकास कार्यों को लेकर किसी भी प्रकार की लापरवाही या पक्षपात कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” संगठन प्रमुख के इस त्वरित और संवेदनशील रुख ने जहां एक ओर पीड़ित महिला पार्षद को संबल प्रदान किया है, वहीं दूसरी ओर तानाशाही रवैया अपना रहे पालिका प्रबंधन के खेमे में हड़कंप मचा दिया है।
सत्ता के मद में चूर वित्तीय मनमानी और ‘पसंदीदा’ राष्ट्रवाद।
जिला कलेक्टर को सौंपे गए साक्ष्यों और शिकायती पत्र के अनुसार, पालिका अध्यक्ष राज जायसवाल पर शासकीय पद के घोर दुरुपयोग और वित्तीय एवं प्रशासनिक अराजकता के अत्यंत गंभीर आरोप हैं। आरोप है कि अध्यक्ष द्वारा पालिका के मूलभूत वैधानिक नियमों को धता बताकर केवल अपने चहेते वार्डों में नियम-विरुद्ध तरीके से वित्तीय स्वीकृतियां बांटी जा रही हैं। सरकारी खजाने की जन-धन राशि से निजी ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए जो अपवित्र साठगांठ की जा रही है, वह सीधे तौर पर संस्थागत भ्रष्टाचार और वित्तीय अनाचार की श्रेणी में आता है।
जनहित का गला घोंटती प्रतिशोधात्मक राजनीति
एक जनप्रतिनिधि का परम कर्तव्य लोक-कल्याण होता है, किंतु इस मामले में अध्यक्ष की व्यक्तिगत दुर्भावना और द्वेषपूर्ण रवैया खुलकर सामने आया है। शिकायतकर्ता के अनुसार, अध्यक्ष सार्वजनिक मंचों से खुलेआम यह धौंस देते हैं कि “तुम्हारे वार्ड में कोई काम नहीं होने दूंगा।” इस राजनैतिक प्रतिशोध के कारण वार्ड क्रमांक 01 की निर्दोष जनता आज पानी, सड़क और स्वच्छता जैसी मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं के लिए तरस रही है। यह कृत्य एक निर्वाचित प्रतिनिधि को उसके संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन से बलपूर्वक रोकने का एक अक्षम्य प्रशासनिक अपराध है।
भरे केबिन में स्वाभिमान का चीरहरण: सरेआम छलके महिला पार्षद के आंसू।
इस पूरे विवाद का सबसे कारुणिक और विचलित कर देने वाला दृश्य तब सामने आया, जब जनसमस्याओं को लेकर महिला पार्षद पालिका अध्यक्ष के केबिन में उपस्थित हुईं। सत्ता के अहंकार और मद में चूर अध्यक्ष राज जायसवाल ने पद की गरिमा और शालीनता की समस्त सीमाओं को लांघ दिया। भरे केबिन में शासकीय अधिकारियों, अन्य जनप्रतिनिधियों और निजी ठेकेदारों की उपस्थिति में महिला पार्षद के साथ ऐसा अशोभनीय, अमर्यादित और घोर अभद्र व्यवहार किया गया, जिसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया।
एक गौरवशाली जनजातीय संस्कृति से आने वाली और जनता द्वारा चुनकर भेजी गई महिला प्रतिनिधि के स्वाभिमान को उस बंद कमरे में इस कदर कुचला गया कि वे अपने भीतर उमड़े आत्म-सम्मान के दर्द और आंसुओं के सैलाब को रोक नहीं पाईं। सबके सामने एक निर्दोष महिला की आंखों से बहते वे आंसू केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं थे, बल्कि वे सत्ता के गलियारों में दम तोड़ती राजनैतिक मर्यादा और नारी अस्मिता की बेबसी की मूक गवाही दे रहे थे। यह हृदयविदारक घटना अध्यक्ष की सामंती, पितृसत्तात्मक और लैंगिक पूर्वाग्रह से ग्रसित संकीर्ण मानसिकता का जीवंत प्रमाण है।
गंभीर धमकियां और प्रशासनिक आवक
वित्तीय अनियमितताओं और इस अभद्र व्यवहार के विरुद्ध आवाज उठाने पर महिला पार्षद को गंभीर परिणाम भुगतने, वार्ड के विकास कार्य ठप करने और झूठे मुकदमों में फंसाकर उनका सामाजिक व राजनैतिक जीवन पूर्णतः नष्ट करने की धमकियां लगातार दी जा रही हैं। इस दमनकारी रवैये ने उन्हें गहरे मानसिक अवसाद और असुरक्षा के साए में जीने को विवश कर दिया है। कलेक्टर कार्यालय में शिकायत दर्ज कराकर पीड़ित पार्षद ने आधिकारिक रूप से अपनी बात शासन के समक्ष रख दी है।
भाजपा शासनकाल में महिला जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा पर यक्ष प्रश्न
यह अत्यंत चिंताजनक और विरोधाभासी स्थिति है कि जिस भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शासनकाल में महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और सशक्तिकरण को शासन की सर्वोपरि प्राथमिकता बताया जाता है, उसी दल की एक समर्पित आदिवासी महिला कार्यकर्ता और चुनी हुई पार्षद आज व्यवस्था के भीतर खुद को इस कदर असहाय और प्रताड़ित महसूस कर रही थीं। हालांकि जिलाध्यक्ष गोपाल मोदी के हस्तक्षेप ने संगठन की संवेदनशीलता और नारी सम्मान के प्रति प्रतिबद्धता को साबित किया है, परंतु स्थानीय शासकीय स्तर पर शिकायत सौंपे जाने के बाद अब प्रबुद्ध समाज यह देखने को उत्सुक है कि प्रशासनिक तंत्र कितनी मुस्तैदी से इस पर कदम उठाता है।
बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि सत्ता के सर्वोच्च केंद्रों पर बैठी महिला प्रतिनिधि को अपनी मर्यादा के लिए संघर्ष करना पड़े, तो आम महिलाओं के आत्मविश्वास की रक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।
संगठन से लेकर प्रशासन तक न्याय की अंतिम आस।
पीड़ित पार्षद ने अपनी सुरक्षा, आत्मसम्मान और जनहित की बहाली के लिए निम्नलिखित त्रिस्तरीय वैधानिक एवं राजनैतिक मांगें रखी हैं:
1. पुलिस प्रशासन (SP) से: केबिन के भीतर किए गए दुर्व्यवहार, डराने-धमकाने और मानसिक प्रताड़ना के इस घृणित मामले में पालिका अध्यक्ष के खिलाफ तत्काल आपराधिक प्रकरण (FIR) दर्ज कर वैधानिक कार्रवाई की जाए।
2. जिला प्रशासन (कलेक्टर) से: शासकीय पद का दुरुपयोग करने वाले दोषी अध्यक्ष के वित्तीय लेन-देन की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच शुरू की जाए और उन्हें तत्काल दंडात्मक रूप से उत्तरदायी ठहराया जाए, तथा वार्ड क्रमांक 01 के रुके हुए विकास कार्यों को अविलंब प्रारंभ कराया जाए।
3. भाजपा संगठन से: जिलाध्यक्ष गोपाल मोदी द्वारा दिए गए कड़े निर्देशों के अनुपालन में, शासकीय पद और अधिकारों का दुरुपयोग करने वाले तत्वों के खिलाफ दंडात्मक राजनैतिक कदम उठाए जाएं।
कलेक्टर एवं एसपी कार्यालय द्वारा शिकायत की प्रति आधिकारिक रूप से स्वीकार कर ली गई है। प्रबुद्ध नागरिकों और राजनैतिक विश्लेषकों की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या जिलाध्यक्ष के कड़े रुख और प्रशासनिक पत्रों के आदान-प्रदान के बाद यह व्यवस्था एक प्रताड़ित महिला जनप्रतिनिधि को उसका खोया हुआ सम्मान और अधिकार लौटा पाती है, या फिर सत्ता का रसूख न्याय की इस आवाज को प्रभावित करने का प्रयास करेगा।